\\ काव्य संग्रह \\

हिंदी कविताओं के बारे में एक ब्लॉग लिखने का विचार बहुत ही अच्छा है। हिंदी कविताएं हमारी भाषा, संस्कृति, इतिहास और भावनाओं का अनूठा संगम हैं। हिंदी कविताओं के माध्यम से हम अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त कर सकते हैं, चाहे वह प्रेम हो, दुःख हो, प्रकृति हो, देशभक्ति हो या कुछ और। हिंदी कविताओं का असर हमारे मन और आत्मा पर होता है, वे हमें प्रेरित करती हैं, हंसाती हैं, रुलाती हैं और कभी-कभी हमारी आँखों को खोलती हैं।

इस ब्लॉग में मैं आपको हिंदी कविताओं की एक रोचक दुनिया में ले जाऊंगा, जहां आप विभिन्न विषयों और शैलियों पर लिखी गई कुछ प्रसिद्ध और कुछ अनजान कविताओं को पढ़ सकेंगे |

“गिर जाना मेरा अंत नहीं”

परमे परवाज़ की शक्ति है , मन में आगाज़ की शक्ति है ,
वो चोच में तिनका डालें , डाली पर दो आँखे तकती है ,
वो परख रही है , तूफ़ा के बाज़ू में कितनी ताक़त है ,
वो देख रही है आसमान में नाम मात्र की राहत है ,
पर लगी साँस जब फूलने तो तूफ़ा ने मौका लपक लिया ,
आसमा की उमीदो को ला धरती पर पटक दिया ,
पर झाड़ रही है धूल परो से , रगो में गज़ब रवानी है ,
चोट खाने के बावजूद उड़ने की ललख पुरानी है ,
ग़लत करूंगा साबित सबको , यहां कोई अरिहंत नहीं ,
गिर जाना मेरा अंत नहीं ,गिर जाना मेरा अंत नहीं |

मुखड़े पर धूल लगी माना , माथा फूटा माना लेकिन ,
गालों पर थप्पड़ खाये है , जबड़ा टूटा माना लेकिन ,
माना के आंते अकड़ गई , पसलियों से लहू निकलता है ,
गिस गया है कंकर में घुटना , मिर्च सलिखे जलता है ,
माना के साँसे उखड़ रही, और धक्का लगता धड़कन से ,
लो मान लिया की काँप गया है , पूर्ण बदन अंतर्मन से ,
पर आँखों से अंगारे , नथनों से तूफ़ा लाऊंगा ,
में गिर गिर कर भी धरती पर , हर रोज़ खड़ा हो जाऊंगा ,
मुठ्ठी में बींच लिया तारा , तुम नगर में ढोल पिटादो जी ,
अँधेरे हो लाख़ घने पर अँधेरे अनन्त नहीं ,
गिर जाना मेरा अंत नहीं , गिर जाना मेरा अंत नहीं|

-अनूपम

“तुम मुझको कब तक रोकोगे कविता”

मुठ्ठी में कुछ सपने लेकर, भरकर जेबों में आशाएं ।
दिल में है अरमान यही, कुछ कर जाएं… कुछ कर जाएं… ।
सूरज-सा तेज़ नहीं मुझमें, दीपक-सा जलता देखोगे..
सूरज-सा तेज़ नहीं मुझमें, दीपक-सा जलता देखोगे…
अपनी हद रौशन करने से,
तुम मुझको कब तक रोकोगे…
तुम मुझको कब तक रोकोगे… । ।

मैं उस माटी का वृक्ष नहीं जिसको नदियों ने सींचा है…
बंजर माटी में पलकर मैंने…मृत्यु से जीवन खींचा है… ।
मैं पत्थर पर लिखी इबारत हूँ… शीशे से कब तक तोड़ोगे..
मैं पत्थर पर लिखी इबारत हूँ ..शीशे से कब तक तोड़ोगे..
मिटने वाला मैं नाम नहीं…
तुम मुझको कब तक रोकोगे…
तुम मुझको कब तक रोकोगे…।।

इस जग में जितने ज़ुल्म नहीं, उतने सहने की ताकत है ….
तानों के भी शोर में रहकर सच कहने की आदत है ।।
मैं सागर से भी गहरा हूँ…तुम कितने कंकड़ फेंकोगे..
मैं सागर से भी गहरा हूँ…तुम कितने कंकड़ फेंकोगे..
चुन-चुन कर आगे बढूँगा मैं…
तुम मुझको कब तक रोकोगे…
तुम मुझको कब तक रोकोगे..।।

झुक-झुककर सीधा खड़ा हुआ, अब फिर झुकने का शौक नहीं..
अपने ही हाथों रचा स्वयं.. तुमसे मिटने का खौफ़ नहीं…
तुम हालातों की भट्टी में… जब-जब भी मुझको झोंकोगे…
तुम हालातों की भट्टी में… जब-जब भी मुझको झोंकोगे…
तब तपकर सोना बनूंगा मैं…
तुम मुझको कब तक रोकोगे…
तुम मुझको कब तक रोक़ोगे…।।

– R D Tailang

“आओ फिर से दिया जलाएँ “

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्त्तमान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

– अटल बिहारी वाजपेयी

“कोशिश करने वालों की हार नहीं होती”

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

-सोहनलाल द्विवेदी

“मैं शून्य पे सवार हूँ”

मैं शून्य पे सवार हूँ

बेअदब सा मैं खुमार हूँ

अब मुश्किलों से क्या डरूं

मैं खुद कहर हज़ार हूँ

मैं शून्य पे सवार हूँ

मैं शून्य पे सवार हूँ

उंच-नीच से परे

मजाल आँख में भरे

मैं लड़ रहा हूँ रात से

मशाल हाथ में लिए

न सूर्य मेरे साथ है

तो क्या नयी ये बात है

वो शाम होता ढल गया

वो रात से था डर गया

मैं जुगनुओं का यार हूँ

मैं शून्य पे सवार हूँ

भावनाएं मर चुकीं

संवेदनाएं खत्म हैं

अब दर्द से क्या डरूं

ज़िन्दगी ही ज़ख्म है

मैं बीच रह की मात हूँ

बेजान-स्याह रात हूँ

मैं काली का श्रृंगार हूँ

मैं शून्य पे सवार हूँ

हूँ राम का सा तेज मैं

लंकापति सा ज्ञान हूँ

किस की करूं आराधना

सब से जो मैं महान हूँ

ब्रह्माण्ड का मैं सार हूँ

मैं जल-प्रवाह निहार हूँ

मैं शून्य पे सवार हूँ

मैं शून्य पे सवार हूँ

-Zakir Khan

“जो बीत गई”

हरिवंशराय बच्चन

जो बीत गई सो बात गई है

जीवन में एक सितारा था

माना वह बेहद प्यारा था

वह डूब गया तो डूब गया

अम्बर के आनन को देखो

कितने इसके तारे टूटे

कितने इसके प्यारे छूटे

जो छूट गए फिर कहाँ मिले

पर बोलो टूटे तारों पर

कब अम्बर शोक मनाता है

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम

थे उस पर नित्य निछावर तुम

वह सूख गया तो सूख गया

मधुवन की छाती को देखो

सूखी कितनी इसकी कलियाँ

मुरझाई कितनी वल्लरियाँ

जो मुरझाई फिर कहाँ खिलीं

पर बोलो सूखे फूलों पर

कब मधुवन शोर मचाता है

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था

तुमने तन मन दे डाला था

वह टूट गया तो टूट गया

मदिरालय का आँगन देखो

कितने प्याले हिल जाते हैं

गिर मिट्टी में मिल जाते हैं

जो गिरते हैं कब उठते हैं

पर बोलो टूटे प्यालों पर

कब मदिरालय पछताता है

जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिटटी के हैं बने हुए

मधु घट फूटा ही करते हैं

लघु जीवन लेकर आए हैं

प्याले टूटा ही करते हैं

फिर भी मदिरालय के अंदर

मधु के घट हैं मधु प्याले हैं

जो मादकता के मारे हैं

वे मधु लूटा ही करते हैं

वह कच्चा पीने वाला है

जिसकी ममता घट प्यालों पर

जो सच्चे मधु से जला हुआ

कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई

“हर एक संकट का हल होगा,

वो आज नहीं तो कल होगा”

हर एक संकट का हल होगा, वो आज नहीं तो कल होगा
माना कि है अंधेरा बहुत और चारों ओर नाकामी
माना कि थक के टूट रहे और सफर अभी दुरगामी है
जीवन की आपाधापी में,जीने का ठिकाना छूट गया
माना कि हिम्मत टूट गई आंखों में निराशा छायी है
माना कि चांद पे ग्रहण है और रात भी गहराई है

पर कृष्ण ने साफ कहा है कि बस कर्म तुम्हारा कल होगा
और कर्म में अगर सच्चाई है तो कर्म कहां निष्फल होगा
हर एक संकट का हल होगा आज नहीं तो कल होगा
लोहा जितना तपता है, उतनी ही ताकत भरता है
सोने को जितनी आग लगे वो उतना प्रखर निकलता है
हीरे पर जितनी धार लगे वो उतना खूब चमकता है
मिट्टी का बर्तन पकता है,तब धुन पर खूब खनकता है

सूरज जैसा बनना है तो, सूरज इतना जलना होगा
नदियों का आदर पाना है तो पर्वत छोर निकलना होगा
और हम आदम के बेटे हैं क्यों सोचे राह सरल होगा
कुछ ज्यादा वक्त लगेगा पर संघर्ष जरुर सफल होगा
हर एक संकट का हल होगा वो आज नहीं तो कल होग

-अनूपम

  "जब तक न मंजिल पा सकूँ , 
                      
                     चलना हमारा काम है" 


गति प्रबल पैरों में भरी 
फिर क्यों रहूं दर दर खड़ा 
जब आज मेरे सामने 
है रास्ता इतना पड़ा 
जब तक न मंजिल पा सकूँ, 
तब तक मुझे न विराम है, 
चलना हमारा काम है। 

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया 
कुछ बोझ अपना बँट गया 
अच्छा हुआ, तुम मिल गई 
कुछ रास्ता ही कट गया 
क्या राह में परिचय कहूँ, 
राही हमारा नाम है, 
चलना हमारा काम है।

 जीवन अपूर्ण लिए हुए 
पाता कभी खोता कभी 
आशा निराशा से घिरा, 
हँसता कभी रोता कभी 
गति-मति न हो अवरुद्ध, 
इसका ध्यान आठो याम है, 
चलना हमारा काम है।

 इस विशद विश्व-प्रहार में 
किसको नहीं बहना पड़ा 
सुख-दुख हमारी ही तरह, 
किसको नहीं सहना पड़ा 
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, 
मुझ पर विधाता वाम है, 
चलना हमारा काम है।

 मैं पूर्णता की खोज में 
दर-दर भटकता ही रहा 
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ 
रोड़ा अटकता ही रहा 
निराशा क्यों मुझे? 
जीवन इसी का नाम है, 
चलना हमारा काम है।

 साथ में चलते रहे 
कुछ बीच ही से फिर गए 
गति न जीवन की रुकी 
जो गिर गए सो गिर गए 
रहे हर दम, 
उसी की सफलता अभिराम है, 
चलना हमारा काम है। 
फकत यह जानता 
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज 
दो घूँट हँसकर पी गया 
सुधा-मिश्रित गरल, 
वह साकिया का जाम है, 
चलना हमारा काम है।
                                                               -शिवमंगल सिंह ‘सुमन

कहानी कर्ण की

पांडवो को तुम रखो, मै कौरवो की भीड से
तिलक शिकस्त के बीच में जो टूटे ना वो रीड़ मै
सूरज का अंश हो के फिर भी हुँ अछूत मै
आर्यव्रत को जीत ले ऐसा हुँ सूत पूत मै
कुंती पुत्र हुँ मगर न हुँ उसी को प्रिय मै
इंद्र मांगे भीख जिससे ऐसा हुँ क्षत्रिय मै
आओ मैं बताऊँ महाभारत के सारे पात्र ये
भोले की सारी लीला थी किशन के हाथ सूत्र थे
बलशाली बताया जिसे सारे राजपुत्र थे
काबिल दिखाया बस लोगो को ऊँची गोत्र के
सोने को पिघला कर डाला सोन तेरे कंठ में
नीची जाती हो के किया वेद का पठंतु ने
यही था गुनाह तेरा,तु सारथी का अंश था
तो क्यो छिपे मेरे पीछे ,मै भी उसी का वंश था
ऊँच नीच की ये जड़ वो अहंकारी द्रोण था
वीरो की उसकी सूची में,अर्जुन के सिवा कौन था
माना था माधव को वीर,तो क्यो डरा एकलव्य से
माँग के अंगूठा क्यों जताया पार्थ भव्य है
रथ पे सजाया जिसने क्रष्ण हनुमान को
योद्धाओ के युद्ध में लडाया भगवान को
नन्दलाल तेरी ढाल पीछे अंजनेय थे
नीयती कठोर थी जो दोनो वंदनीय थे
ऊँचे ऊँचे लोगो में मै ठहरा छोटी जात का
खुद से ही अंजान मै ना घर का ना घाट का
सोने सा था तन मेरा,अभेद्य मेरा अंग था
कर्ण का कुंडल चमका लाल नीले रंग का
इतिहास साक्ष्य है योद्धा मै निपूण था
बस एक मजबूरी थी,मै वचनो का शौकीन था
अगर ना दिया होता वचन,वो मैने कुंती माता को
पांडवो के खून से,मै धोता अपने हाथ को
साम दाम दंड भेद सूत्र मेरे नाम का
गंगा माँ का लाडला मै खामखां बदनाम था
कौरवो से हो के भी कोई कर्ण को ना भूलेगा
जाना जिसने मेरा दुख वो कर्ण कर्ण बोलेगा
भास्कर पिता मेरे ,हर किरण मेरा स्वर्ण है
वर्ण में अशोक मै,तु तो खाली पर्ण है
कुरुक्षेत्र की उस मिट्टी में,मेरा भी लहू जीर्ण है
देख छानके उस मिट्टी को कण कण में कर्ण है

Abhi Munde

“वीरता के बाद भी विन्रमता का स्वर”

हे सूरज इतना याद रहे, संकट एक सूरज वंश पे है,
लंका के नीच राहु द्वारा आघात दिनेश अंश पर है।

इसीलिए छिपे रहना भगवन जब तक न जड़ी पंहुचा दूं मैं,
बस तभी प्रकट होना दिनकर जब संकट निशा मिटा दूं मैं।

मेरे आने से पहले यदि किरणों का चमत्कार होगा,
तो सूर्य वंश में सूर्यदेव निश्चित ही अंधकार होगा।

आशा है स्वल्प प्रार्थना ये सच्चे जी से स्वीकरोगे,
आतुर की आर्थ अवस्था को होकर करुणार्ध निहारोगे।

अन्यथा छमा करना दिनकर, अंजनी तनै से पाला है,
बचपन से जान रहे हो तुम हनुमत कितना मतवाला है।

मुख में तुमको धर रखने का फिर वही क्रूर साधन होगा,
बंदी मोचन तब होगा जब लक्ष्मण का दुःख मोचन होगा।


                                  -राधेश्याम रामायण                                                              

“सच है, विपत्ति जब आती है”

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।

मुख से न कभी उफ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।

है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है
रोशनी नहीं वह पाता है।

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।

वसुधा का नेता कौन हुआ?
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया,
विघ्नों में रहकर नाम किया।

जब विघ्न सामने आते हैं,
सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,
तन को झँझोरते हैं पल-पल।
सत्पथ की ओर लगाकर ही,
जाते हैं हमें जगाकर ही।

वाटिका और वन एक नहीं,
आराम और रण एक नहीं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।
वन में प्रसून तो खिलते हैं,
बागों में शाल न मिलते हैं।

कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,
छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,
वे ही सूरमा निकलते हैं।

बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,
मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,
तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?
– रामधारी सिंह दिनकर

“चारु चंद्र की चंचल किरणें”

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
    स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
    मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
    जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
    भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
    राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
    जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
    तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
    विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
    आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
    मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
    है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
    पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
    रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
    शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
    अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
    पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
    वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
    किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
    व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
    पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!

-मैथिलीशरण गुप्त

“वीरांगना”

मैंने उसको
जब-जब देखा
लोहा देखा
लोहे जैसा-
तपते देखा-
गलते देखा-
ढलते देखा
मैंने उसको
गोली जैसा
चलते देखा।

-Kedarnath Agarwal

“उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना जरूरी है”

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

                             
                               -  वसीम बरेलवी                                         

स्वयं श्रीवास्तव शायरी :

एक शख्स क्या गया की पूरा काफिला गया

तूफ़ा था तेज पेड़ को जड़ से हिला गया,

जब सल्तनत से दिल की ही रानी चली गई..

फिर क्या मलाल तख्त गया या किला गया ।

किस्मत मे कोई रंग क्या धानी भी लिखा है

बस हरफ ही लिखे हैं या मानी भी लिखा है

सूखी जुबान जिंदगी से पूछने लगी

बस प्यास भी लिखी है की पानी ही लिखा है।

पत्थर की चमक है न नगीने की चमक है

चेहरे पे सीना तान के जीने की चमक है,

पुरखों से विरासत मे हमें कुछ न मिला था

जो दिख रही है खून पसीने की चमक है ।

किस्मत की बाजियों पर इख्तियार नहीं है

सब कुछ है जिंदगी मे मगर प्यार नहीं है,

कोई था जिसको यार करके गा रहे हैं

हम आखों मे किसी का अब इंतजार नहीं है।

जंगल जो जलाए थे उनमे बस्तियां भी थी

काटों के साथ फ़ूल पे कुछ तितलियाँ भी थी,

तुमने तो गला घोंट दिया तुमको को क्या एहसास

इसमे किसी के नाम की कुछ हिचकियां भी थी ।

मुझको नया रोकिए, ना ये नजराने दीजिए

मेरा सफ़र अलग है मुझे जाने दीजिए,

ज्यादा से ज्यादा होगा ये की हार जाएंगे…

किस्मत तो हमें अपनी आजमाने दीजिए।

मुश्किल थी सम्हालना ही पड़ा घर के वास्ते,

फिर घर से निकालना ही पड़ा घर के वास्ते.

मजबूरीयों का नाम हमने शौक रख दिया,

हर शौक बदलना ही पड़ा घर के वास्ते ।

बचपन को भुलाकर, लगाया काम गले से,

स्वीकार किया वक्त का इनाम गले से,

ठोकर लगी जब तेज से तो गिर पड़े लेकिन,

गिर-गिर के भी उठना ही पड़ा घर के वास्ते।

अनजान डगर थी मगर चलते रहे हर दिन

मंजिल दिखेगी सोचकर आएगा एक दिन

विश्वास खो रहा था, कहीं दूर थी मंजिल,

विश्वास जगाना भी पड़ा घर के वास्ते।

न साथ था कोई, न ही दिखता था घर मेरा,

उस दिन के ऊजाले में भी लगता था अंधेरा,

रहने लगे कमरे में उसको घर बना लिया,

और घर को भूलना ही पड़ा घर के वास्ते।

“नर हो, न निराश करो मन को” –मैथिलीशरण गुप्त

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को 

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के 
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को 

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

– मैथिलीशरण गुप्त

“हे भारत के राम जगो” –आशुतोष राणा

हे भारत के राम जगो, मैं तुम्हे जगाने आया हूँ,

सौ धर्मों का धर्म एक, बलिदान बताने आया हूँ ।

सुनो हिमालय कैद हुआ है, दुश्मन की जंजीरों में

आज बता दो कितना पानी, है भारत के वीरो में,

खड़ी शत्रु की फौज द्वार पर, आज तुम्हे ललकार रही,

सोये सिंह जगो भारत के, माता तुम्हे पुकार रही ।

रण की भेरी बज रही, उठो मोह निद्रा त्यागो,

पहला शीष चढाने वाले, माँ के वीर पुत्र जागो।

बलिदानों के वज्रदंड पर, देशभक्त की ध्वजा जगे,

और रण के कंकण पहने है, वो राष्ट्रभक्त की भुजा जगे ।।

अग्नि पंथ के पंथी जागो, शीष हथेली पर धरकर,

जागो रक्त के भक्त लाडले, जागो सिर के सौदागर,

खप्पर वाली काली जागे, जागे दुर्गा बर्बंडा,

और रक्त बीज का रक्त चाटने, वाली जागे चामुंडा ।

नर मुंडो की माला वाला, जगे कपाली कैलाशी,

रण की चंडी घर घर नाचे, मौत कहे प्यासी प्यासी,

रावण का वध स्वयं करूँगा, कहने वाला राम जगे,

और कौरव शेष न एक बचेगा, कहने वाला श्याम जगे ।।

परशुराम का परशु जगे, रघुनन्दन का बाण जगे ,

यदुनंदन का चक्र जगे, अर्जुन का धनुष महान जगे,

चोटी वाला चाणक्य जगे, पौरुष का पुरष महान जगे

और सेल्यूकस को कसने वाला, चन्द्रगुप्त बलवान जगे ।

हठी हमीर जगे जिसने, झुकना कभी नहीं जाना,

जगे पद्मिनी का जौहर, जागे केसरिया बाना,

देशभक्ति का जीवित झण्डा, आजादी का दीवाना,

और वह प्रताप का सिंह जगे, वो हल्दी घाटी का राणा

दक्खिन वाला जगे शिवाजी, खून शाहजी का ताजा,

मरने की हठ ठाना करते, विकट मराठो के राजा,

छत्रसाल बुंदेला जागे, पंजाबी कृपाण जगे,

दो दिन जिया शेर के माफिक, वो टीपू सुल्तान जगे ।

कनवाहे का जगे मोर्चा, जगे झाँसी की रानी,

अहमदशाह जगे लखनऊ का, जगे कुंवर सिंह बलिदानी,

कलवाहे का जगे मोर्चा, पानीपत मैदान जगे,

जगे भगत सिंह की फांसी, राजगुरु के प्राण जगे

जिसकी छोटी सी लकुटी से (बापू ), संगीने भी हार गयी,

हिटलर को जीता वे फौजेे, सात समुन्दर पार गयी,

मानवता का प्राण जगे, और भारत का अभिमान जगे,

उस लकुटि और लंगोटी वाले, बापू का बलिदान जगे।

आजादी की दुल्हन को जो, सबसे पहले चूम गया,

स्वयं कफ़न की गाँठ बाँधकर, सातों भावर घूम गया,

उस सुभाष की शान जगे, उस सुभाष की आन  जगे,

ये भारत देश महान जगे, ये भारत की संतान जगे ।

क्या कहते हो मेरे भारत से चीनी टकराएंगे ?

अरे चीनी को तो हम पानी में घोल घोल पी जाएंगे,

वह बर्बर था वह अशुद्ध था, हमने उनको शुद्ध किया,

वह बर्बर था वह अशुद्ध था, हमने उनको शुद्ध किया,

हमने उनको बुद्ध दिया था, उसने हमको युद्ध दिया ।

आज बँधा है कफ़न शीष पर, जिसको आना है आ जाओ,

चाओ-माओ चीनी-मीनी, जिसमें दम हो टकराओ

जिसके रण से बनता है, रण का केसरिया बाना,

ओ कश्मीर हड़पने वाले, कान खोल सुनते जाना ।।

भारत के केसर की कीमत तो केवल सर है

कोहिनूर की कीमत जूते पांच अजर अमर हैं

रण के खेतो में जब छायेगा, अमर मृत्यु का सन्नाटा,

रण के खेतो में जब छायेगा, अमर मृत्यु का सन्नाटा,

लाशो की जब रोटी होंगी, और बारूदों का आटा,

सन सन करते वीर चलेंगे, जो बामी से फन वाला,

फिर चाहे रावलपिंडी वाले हो, या हो पेकिंग वाला ।

जो हमसे टकराएगा, वो चूर चूर हो जायेगा,

इस मिटटी को छूने वाला, मिटटी में मिल जायेगा,

मैं घर घर में इन्कलाब की, आग लगाने आया हूँ,

हे भारत के राम जगो, मैं तुम्हे जगाने आया हूं ।।

“है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है” -हरिवंशराय बच्चन

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए” -दुष्यंत कुमार 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

“यह दिया बुझे नहीं” – गोपाल सिंह नेपाली

यह दिया बुझे नहीं

घोर अंधकार हो
चल रही बयार हो
आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ
शक्ति को दिया हुआ
भक्ति से दिया हुआ
यह स्वतंत्रता–दिया

रूक रही न नाव हो
जोर का बहाव हो
आज गंग–धार पर यह दिया बुझे नहीं
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।

यह अतीत कल्पना
यह विनीत प्रार्थना
यह पुनीत भावना
यह अनंत साधना

शांति हो, अशांति हो
युद्ध, संधि, क्रांति हो
तीर पर¸ कछार पर¸ यह दिया बुझे नहीं
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है।

तीन–चार फूल है
आस–पास धूल है
बांस है –बबूल है
घास के दुकूल है

वायु भी हिलोर दे
फूंक दे, चकोर दे
कब्र पर मजार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह किसी शहीद का पुण्य–प्राण दान है।

झूम–झूम बदलियाँ
चूम–चूम बिजलियाँ
आंधिया उठा रहीं
हलचलें मचा रहीं

लड़ रहा स्वदेश हो
यातना विशेष हो
क्षुद्र जीत–हार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।

“आए जिस जिस की हिम्मत हो ” -अटल बिहारी वाजपेयी

हिन्दु महोदधि की छाती में धधकी अपमानों की ज्वाला,

और आज आसेतु हिमाचल मूर्तिमान हृदयों की माला ।

सागर की उत्ताल तरंगों में जीवन का जी भर कृन्दन,

सोने की लंका की मिट्टी लख कर भरता आह प्रभंजन ।

शून्य तटों से सिर टकरा कर पूछ रही गंगा की धारा,

सगरसुतों से भी बढ़कर हां आज हुआ मृत भारत सारा ।

यमुना कहती कृष्ण कहाँ है, सरयू कहती राम कहाँ है

व्यथित गण्डकी पूछ रही है, चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ है?

अर्जुन का गांडीव किधर है, कहाँ भीम की गदा खो गयी

किस कोने में पांचजन्य है, कहाँ भीष्म की शक्ति सो गयी?

अगणित सीतायें अपहृत हैं, महावीर निज को पहचानो

अपमानित द्रुपदायें कितनी, समरधीर शर को सन्धानो ।

अलक्षेन्द्र को धूलि चटाने वाले पौरुष फिर से जागो

क्षत्रियत्व विक्रम के जागो, चणकपुत्र के निश्चय जागो ।

कोटि कोटि पुत्रो की माता अब भी पीड़ित अपमानित है

जो जननी का दुःख न मिटायें उन पुत्रों पर भी लानत है ।

लानत उनकी भरी जवानी पर जो सुख की नींद सो रहे

लानत है हम कोटि कोटि हैं, किन्तु किसी के चरण धो रहे ।

अब तक जिस जग ने पग चूमे, आज उसी के सम्मुख नत क्यों

गौरवमणि खो कर भी मेरे सर्पराज आलस में रत क्यों?

गत गौरव का स्वाभिमान ले वर्तमान की ओर निहारो

जो जूठा खा कर पनपे हैं, उनके सम्मुख कर न पसारो ।

पृथ्वी की संतान भिक्षु बन परदेसी का दान न लेगी

गोरों की संतति से पूछो क्या हमको पहचान न लेगी?

हम अपने को ही पहचाने आत्मशक्ति का निश्चय ठाने

पड़े हुए जूठे शिकार को सिंह नहीं जाते हैं खाने ।

एक हाथ में सृजन दूसरे में हम प्रलय लिए चलते हैं

सभी कीर्ति ज्वाला में जलते, हम अंधियारे में जलते हैं ।

आँखों में वैभव के सपने पग में तूफानों की गति हो

राष्ट्र भक्ति का ज्वार न रुकता, आए जिस जिस की हिम्मत हो ।

कहानी कर्ण की-Abhi Munde

पांडवो को तुम रखो, मै कौरवो की भीड से
तिलक शिकस्त के बीच में जो टूटे ना वो रीड़ मै
सूरज का अंश हो के फिर भी हुँ अछूत मै
आर्यव्रत को जीत ले ऐसा हुँ सूत पूत मै
कुंती पुत्र हुँ मगर हुँ उसी को प्रिय मै
इंद्र मांगे भीख जिससे ऐसा हुँ क्षत्रिय मै
आओ मैं बताऊँ महाभारत के सारे पात्र ये
भोले की सारी लीला थी किशन के हाथ सूत्र थे
बलशाली बताया जिसे सारे राजपुत्र थे
काबिल दिखाया बस लोगो को ऊँची गोत्र के
सोने को पिघला कर डाला सोन तेरे कंठ में
नीची जाती हो के किया वेद का पठंतु ने
यही था गुनाह तेरा,तु सारथी का अंश था
तो क्यो छिपे मेरे पीछे ,मै भी उसी का वंश था
ऊँच नीच की ये जड़ वो अहंकारी द्रोण था
वीरो की उसकी सूची में,अर्जुन के सिवा कौन था
माना था माधव को वीर,तो क्यो डरा एकलव्य से
माँग के अंगूठा क्यों जताया पार्थ भव्य है
रथ पे सजाया जिसने क्रष्ण हनुमान को
योद्धाओ के युद्ध में लडाया भगवान को
नन्दलाल तेरी ढाल पीछे अंजनेय थे
नीयती कठोर थी जो दोनो वंदनीय थे
ऊँचे ऊँचे लोगो में मै ठहरा छोटी जात का
खुद से ही अंजान मै ना घर का ना घाट का
सोने सा था तन मेरा,अभेद्य मेरा अंग था
कर्ण का कुंडल चमका लाल नीले रंग का
इतिहास साक्ष्य है योद्धा मै निपूण था
बस एक मजबूरी थी,मै वचनो का शौकीन था
अगर ना दिया होता वचन,वो मैने कुंती माता को
पांडवो के खून से,मै धोता अपने हाथ को
साम दाम दंड भेद सूत्र मेरे नाम का
गंगा माँ का लाडला मै खामखां बदनाम था
कौरवो से हो के भी कोई कर्ण को ना भूलेगा
जाना जिसने मेरा दुख वो कर्ण कर्ण बोलेगा
भास्कर पिता मेरे ,हर किरण मेरा स्वर्ण है
वर्ण में अशोक मै,तु तो खाली पर्ण है
कुरुक्षेत्र की उस मिट्टी में,मेरा भी लहू जीर्ण है
देख छानके उस मिट्टी को कण कण में कर्ण है

“कोई दीवाना कहता है”

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है

मैं तुजसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है

मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है

यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आँखों में आंसू हैं
जो तू समजे तो मोती हैं, जो ना समजे तो पानी हैं

समंदर पीड़ का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है, इसको खो नहीं सकता

मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया, वो तेरा हो नहीं सकता

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा

अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हंगामा

बदल ने को तो इन आँखों के मंज़र काम नहीं बदले
तुम्हारे प्यार के मौसम, हमारे ग़म नहीं बदले

तुम अगले जन्म में हमसे मिलोगी तब तो जानोगी
ज़माने और सदी के बदल में हम नहीं बदले

ना पाने की ख़ुशी है कुछ, ना खोने का कुछ ग़म है
ये दौलत और शोहरत सब कुछ ज़ख्मों का मरहम है

अजब सी कश्मकश है रोज़ जीने, रोज़ मरने की
मुकम्मल ज़िन्दगी तो है मगर पूरी से कुछ कम है

ये उर्दू बज़्म है और मैं तो हिंदी माँ का जाया हूँ
ज़बानें मुल्क की बहनें ये ये पैगाम लाया हूँ

मुझे दुगनी मोहब्बत से सुनो उर्दू जुबां वालों !
मैं अपनी माँ का बीटा हूँ, मैं घर मौसी के आया हूँ

इस अधूरी जवानी का क्या फ़ायदा
बिन कथानक कहानी का क्या फ़ायदा
जिसमें धुलकर नज़र भी ना पावन बने
आंख में ऐसे पानी का क्या फ़ायदा

हर एक कपड़े का टुकड़ा माँ का आंचल हो नहीं सकता 
जिसे दुनिया को पाना है वो पागल हो नहीं सकता 

जफ़ाओं की कहानी जब तलक उसमें न शामिल हो 
वफ़ाओं का कोई किस्सा मुकम्मल हो नहीं सकता

किसी के दिल की मायूसी जहां से हो के गुजरी है
हमारी सारी चालाकी वहीं पर खो के गुजरी है

तुम्हारी और मेरी रात में बस फर्क इतना है
तुम्हारी सो के गुजरी है, हमारी रो के गुजरी है

कोई पत्थर की मूरत है किसी पत्थर में मूरत है
लो हमने देख ली दुनिया जो इतनी खूबसूरत है

ज़माना अपनी समझे पर मुझे अपनी खबर ये है
तुझे मेरी जरूरत है मुझे तेरी जरूरत है

                                        – कुमार विश्वास

Design a site like this with WordPress.com
Get started